Nafas ki gazlen

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Wednesday, June 20, 2012

वो मेरा दोस्त है और मुझसे वास्ता भी नहीं
जो कुर्बतें भी नहीं हैं तो फासला भी नहीं

किसे खबर थी की उस दश्त से गुज़ारना है
जहां से लौट के आने का रास्ता भी नहीं

कभी जो फूट के रो ले तो चैन पा जाए
मगर ये दिल मिरे पैरों का आबला भी नहीं

सुना है वो भी मिरे क़त्ल में मुलव्वस है
वो बेवफ़ा  है मगर इतना  बेवफ़ा  भी नहीं

वो सो सका न जिसे छीन  कर कभी मुझसे
मैं उस ज़मीन के बारे में सोचता भी नहीं

ये रेगज़ार मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर हैं
नज़र की हद कहीं कोई काफ़िला भी नहीं

सुना था शहर में हर सू तुम्हारा चर्चा है
यहाँ तो कोई "नफ़स" तुमको जानता भी नहीं

------------------------  नफ़स अम्बालवी 

कुर्बतें=नज़दीकियाँ ; दश्त=जंगल; आबला=छाला; 
मुलव्वस=शामिल; रेगज़ार=रेगिस्तान; ज़ीस्त=ज़िन्दगी 

wo mera dost hai aur mujhse waasta bhi nahin
jo qurbaten bhi nahin hain to faasla bhi nahin

kise khabar thi ki us dasht se guzarna hai
jahaan se lout ke aane ka raasta bhi nahin

kabhi jo phoot ke ro le to chain paa jaaye
magar ye dil mere pairon ka aablaa bhi nahin

suna hai wo bhi mere qatl men mulavvas hai
wo bewafa hai magar itna bewafa bhi nahin

wo so sakaa na jise cheen kar kabhi mujh se
main us zameen ke baare men sochta bhi nahin

ye regzaar meri zeest ka muqaddar hain
nazar ki had men kahin koi qaafila bhi nahin

suna tha shahr men har su tumhaara charcha hai
yahaan to koi "nafas" tumko jaanta bhi nahin

----------------------------  Nafas Ambalvi

Thursday, June 14, 2012



ग़ज़ल

यूँ तो खुद अपने ही साए से भी डर जाते  लोग
हादसे कैसे भी हों लेकिन गुज़र जाते हैं लोग 

जब ग़मों की आँधियों में मुश्किलें मुझ पर पड़ीं 
तब मैं समझा रेज़ा  रेज़ा क्यूँ बिखर जाते हैं लोग 

सिर्फ़  गाज़ा ही नहीं चेहरों की रानाई का राज़ 
शिद्दत-ए-ग़म की तपिश में भी निखर जाते हैं लोग 

मसअले आ कर लिपट जाते हैं बच्चों की तरह
शाम को जब लौट कर दफ्तर से घर जाते हैं लोग 

इससे आगे भी कोई दुनिया है इस दुनिया के बाद  
बाद मरने के भला आख़िर किधर जाते हैं लोग 

हाथ जब कोई बुझाने के लिए उठता नहीं
देख कर जलता हुआ घर क्यूँ ठहर जाते हैं लोग

हर "नफ़स" मर मर के जीते हैं तुझे ऐ जिंदगी
और जीने की तमन्ना में ही मर जाते हैं लोग  


Sunday, October 9, 2011

ग़ज़ल के बादशाह मरहूम जगजीत सिंह की याद में......

हर रहगुज़र उदास है मंज़र उदास है,
तुम क्या गए सुख़न का समंदर उदास है।

कुछ कम सी हो गई है चरागों में रौशनी,
गमगीं है शाम सुब्ह का अख्तर उदास है।

इस धूप से कहो कि मिरे घर के सहन में,
कुछ देर ठहर जाए मिरा घर उदास है।

लहजे में लर्ज़िशें हैं तखय्युल में बेखुदी,
अशआर कह रहे हैं सुखनवर उदास है।

कुछ तो कमी है तेरे मुजस्सिम में बुततराश !
तुझ में हुनर नहीं है या पत्थर उदास है।

अफ्सुर्दगी का दिल में ये आलम है ऐ 'नफस',
उतरा है जब से दिल में ये खंज़र उदास है।

अख्तर-सितारा, लर्ज़िशें-कंपकपाहट, तखय्युल-कल्पना,
सुखनवर-शायर, मुजस्सिम-मूर्ति, बुततराश-मूर्तिकार, अफ्सुर्दगी-उदासी

Monday, May 24, 2010

ये मेरी खा़मशी जो बे जुबाँ है,
मिरे अलफ़ाज़ का ही तर्जुमाँ है।

Sunday, March 15, 2009

फिर कोई बस्ती जली कुछ आशियाने जल गए,
फिर न जाने किन ग़रीबों के ठिकाने जल गए।

इक डरी सहमी हुई तह्ज़ीब पीछे रह गई,
वो खनकते गीत वो मंज़र सुहाने जल गए।

मुझ को अपने घर के जल जाने का इतना ग़म नहीं,
बस यही अफ़सोस है कुछ ख़त पुराने जल गए।

पत्तियों पर सुबह तक शबनम के मोती थे मगर,
बस ज़रा सी धूप में सारे ख़जाने जल गए।

देख कर बर्तन की जानिब माँ की आँखें रो पड़ीं,
भून कर देने थे जो बच्चों को दाने जल गए।

उस सफ़ीने में फ़क़त बारूद ही बारूद था,
डूबते ही उसके दरिया के मुहाने जल गए।

लो मिरे चेहरे पे भी अब झुर्रियाँ पड़ने लगीं,
वक़्त की इस आग में कितने ज़माने जल गए।

पत्थरों पर जब 'नफ़स' की दास्ताँ तहरीर की,
जल उठे पत्थर भी और सारे फ़साने जल गए।

Saturday, March 14, 2009

दर्द सहने का कोई अहद उठा रक्खा है ?
क्यूँ चरागों को हथेली पे जला रक्खा है ?

ज़ख्म भरने से कहीं और न ग़म बढ़ जाएँ,
हमने ज़ख्मों को इसी डर से खुला रक्खा है।

उस परीरुख की नज़र से ज़रा बच कर रहना,
उसने हर तीर ए नज़र ज़हर बुझा रक्खा है।

रुख हवाओं का दिखाने के लिए ज़ालिम ने,
फाड़ कर ख़त मिरा पुर्ज़ों में उड़ा रक्खा है।

घर की चौखट पे यूँ बेहिस क्यूँ खड़े हो आख़िर,
किसकी उम्मीद पे दरवाज़ा खुला रक्खा है।

ज़िन्दगी हम पे कोई वक़्त का कर्ज़ा है 'नफ़स',
एक एहसाँ है जो मुद्दत से उठा रक्खा है।

درد سہنے کا کوئی عہد اٹھا رکھا ہے
کیوں چراغوں کو ہتھیلی پہ سجا رکھا ہے

زخم بھرنے سے کہیں اور نہ غم بڑھ جاہیں
ہم نے زخموں کو اسی ڈر سے کھلا رکھا ہے

اس پری رخ کی نظر سے ذرا بچ کر رہنا
اس نے ہر تیر _نظر زہر بجھا رکھا ہے

رخ ہواؤں کا دکھانے کے لئے ظالم نے
پھاڑ کر خط مرا پرظوں میں اڑا رکھا ہے

گھر کی چوکھٹ پہ یوں بے حس کیوں کھڑے ہو آخر
کس کی امید پہ دروازہ خلا رکھا ہے

زندگی ہم پہ کوئی وقت کا قرضہ ہے نفس
ایک احساں ہے جو مدّت سے اٹھا رکھا ہے

Saturday, July 12, 2008

सारा आलम बुझा सा लगता है,
वक़्त कितना थका सा लगता है।

हो गया जब से वो जुदा मुझसे,
हर कोई बेवफ़ा सा लगता है।

तू अगर छू भी ले छलक उट्ठे,
शाम से दिल भरा सा लगता है।

वो फ़क़त दोस्त है ख़ुदा तो नहीं
क्यूँ मुझे फ़िर खुदा सा लगता है।

सहमा सहमा है उम्र का चेहरा
आइना भी डरा सा लगता है।

ये क़फ़स और धूप की किरचें,
कोई रौज़न खुला सा लगता है।

क्यूँ 'नफ़स' के सलीब है सर पर
आदमी तो भला सा लगता है।

سارا عالم بجھا سا لگتا ہے
وقت کتنا تھکا سا لگتا ہے

ہو گیا جب سے وہ جدا مجھ سے
ہر کوئی بے وفا سا لگتا ہے

تو اگر چھو بھی لے چھلک اٹھے
شام سے دل بھرا سا لگتا ہے

وہ فقط دوست ہے خدا تو نہیں
کیوں مجھے پھر خدا سا لگتا ہے

سہما سہما ہے عمر کا چہرہ
آئنہ بھی ڈرا سا لگتا ہے

یہ قفص اور دھوپ کی کرچیں
کوئی روزن خلا سا لگتا ہے

کیوں نفس کو صلیب دیتے ہو
آدمی تو بھلا سا لگتا ہے