सारा आलम बुझा सा लगता है,
वक़्त कितना थका सा लगता है।
हो गया जब से वो जुदा मुझसे,
हर कोई बेवफ़ा सा लगता है।
तू अगर छू भी ले छलक उट्ठे,
शाम से दिल भरा सा लगता है।
वो फ़क़त दोस्त है ख़ुदा तो नहीं
क्यूँ मुझे फ़िर खुदा सा लगता है।
सहमा सहमा है उम्र का चेहरा
आइना भी डरा सा लगता है।
ये क़फ़स और धूप की किरचें,
कोई रौज़न खुला सा लगता है।
क्यूँ 'नफ़स' के सलीब है सर पर
आदमी तो भला सा लगता है।
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4 comments:
दोस्त और दोस्ती का दर्जा तो खुदा से भी ऊपर है साहब ! बहुत खूब !
शुभकामनाएं
बहुत अच्छी रचना. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर
बढिया प्रयास है आपका, धन्यवाद । इस नये हिन्दी ब्लाग का स्वागत है ।
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hello sir..
ur certainly n able writter..ur words touched my heart..looking forward to new updates..
keep writting sir.
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