Nafas ki gazlen

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Saturday, July 12, 2008

सारा आलम बुझा सा लगता है,
वक़्त कितना थका सा लगता है।

हो गया जब से वो जुदा मुझसे,
हर कोई बेवफ़ा सा लगता है।

तू अगर छू भी ले छलक उट्ठे,
शाम से दिल भरा सा लगता है।

वो फ़क़त दोस्त है ख़ुदा तो नहीं
क्यूँ मुझे फ़िर खुदा सा लगता है।

सहमा सहमा है उम्र का चेहरा
आइना भी डरा सा लगता है।

ये क़फ़स और धूप की किरचें,
कोई रौज़न खुला सा लगता है।

क्यूँ 'नफ़स' के सलीब है सर पर
आदमी तो भला सा लगता है।

سارا عالم بجھا سا لگتا ہے
وقت کتنا تھکا سا لگتا ہے

ہو گیا جب سے وہ جدا مجھ سے
ہر کوئی بے وفا سا لگتا ہے

تو اگر چھو بھی لے چھلک اٹھے
شام سے دل بھرا سا لگتا ہے

وہ فقط دوست ہے خدا تو نہیں
کیوں مجھے پھر خدا سا لگتا ہے

سہما سہما ہے عمر کا چہرہ
آئنہ بھی ڈرا سا لگتا ہے

یہ قفص اور دھوپ کی کرچیں
کوئی روزن خلا سا لگتا ہے

کیوں نفس کو صلیب دیتے ہو
آدمی تو بھلا سا لگتا ہے


7 comments:

  1. दोस्त और दोस्ती का दर्जा तो खुदा से भी ऊपर है साहब ! बहुत खूब !
    शुभकामनाएं

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  2. बहुत अच्छी रचना. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
    ---
    उल्टा तीर

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  3. बढिया प्रयास है आपका, धन्यवाद । इस नये हिन्दी ब्लाग का स्वागत है ।
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  4. hello sir..
    ur certainly n able writter..ur words touched my heart..looking forward to new updates..
    keep writting sir.

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  5. Dr. Sahab
    Apka andaj aur gazal kehne ka salika lajwab h.
    with best Wishes
    Dr. Prem Singh Pundir
    Ambala Cantt.

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  6. Anita Sharma from SydneyMarch 26, 2010 at 12:01 AM

    Nafas ji, hum toe apke great fan ho gaye hai jee. I look forward to your new gazals, please keep writing. I have read your book 'Khwabon ke Saaye', it's beautiful, can't wait for your next one. God bless you.

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  7. wah bahot acha..

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